तिलक की 100वीं पुण्यतिथि : सुभाष ने मांडले जेल से पत्र लिख यूं दी थी लोकमान्य को श्रद्धांजलि | knowledge – News in Hindi

0
3

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के निधन की आज यानि 01 अगस्त को 100वीं वर्षगांठ है. मुंबई में उनका 1920 में निधन हो गया था लेकिन माना जाता है कि बर्मा (अब म्यांमार) की मांडले सेंट्रल जेल में बिताई 06 साल की कैद से उनकी उम्र घट गई. बाद में इसी जेल में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को रखा गया. नेताजी ने उस जेल और तिलक को लेकर एक लंबा लेख इसी जेल में लिखकर प्रकाशन के लिए भेजा था. अंग्रेजों ने इस पत्र को बैन कर दिया था.

नेताजी संपूर्ण वांग्मय के खंड-3 में ये लेख बाद में पूरा प्रकाशित हुआ. इस पत्र को सेंसर द्वारा इस आधार पर रोक लिया गया था कि इसे सरकार के खिलाफ आलोचनात्मक माना गया था. इसके खास अंश इस तरह हैं. ये लेख उन्होंने नृसिंह चिंतामणि केलकर के नाम लिखकर भेजा था. इसमें उन्होंने लगातार याद किया कि मांडले जेल का तिलक का 06 साल का कारावास कितना कठिन रहा होगा.

मांडले सेंट्रल जेल
20 अगस्त 1925प्रिय श्री केलकर,

मैं पिछले कुछ महीनों से आपको लगातार लिखने की सोचता रहा हूं. मैं नहीं जानता कि आपको मालूम है या नहीं कि मैं यहां गत जनवरी से कारावास में हूं. जब बरहमपुर जेल (बंगाल) से मुझे मांडले जेल के लिए स्थानांतरण का आदेश मिला था, तब मुझे ये स्मरण नहीं आया था कि लोकमान्य तिलक ने अपने कारावास काल का अधिकांश भाग मांडले जेल के लिए स्थानांतरण का आदेश मिला था तो मुझे स्मरण नहीं आया था कि लोकमान्य तिलक ने अपने कारावास काल का अधिकांश भाग मांडले जेल में ही गुजारा था.
जब तक मैं यहां सशरीर आ ही नहीं गया, तब तक चहारदीवारी में यहां के बहुत ही हतोत्साहित कर देने वाले परिवेश में स्वर्गीय लोकमान्य ने अपने सुप्रसिद्ध गीता रहस्य ग्रंथ का प्रणयन किया था जिसने, मेरी नम्र राय में, उन्हें शंकर और रामानुज जैसे प्रकांड भाष्यकारों की श्रेणी में स्थापित कर दिया है.

सुभाष के पत्र को सेंसर द्वारा इस आधार पर रोक लिया गया था कि इसे सरकार के खिलाफ आलोचनात्मक माना गया

लकड़ी का वार्ड और मौसम की मुश्किलें

वह लिखते हैं, जिस वार्ड में लोकमान्य रहते थ, वह आज तक सुरक्षित है, यद्यपि उसमें फेरबदल किया गया है और बड़ा बनाया गया है. हमारे अपने वार्ड की तरह ये लकड़ी के तख्तों से बना है, जिसमें गर्मी में लू और धूप से, वर्षा में पानी से और शीत ऋतु में सर्दी से और सभी ऋतुओं में धूलभरी हवाओं से बचाव नहीं हो पाता. मेरे यहां पहुुंचने के कुछ ही समय बाद मुझे उस वार्ड के बारे में बताया गया. ये जेल भी कुरूप, नीरस और अरुचिकर है लेकिन मेरे लिए ये एक ऐसा तीर्थस्थल है, जहां भारत का एक महानतम सपूत लगातार छह साल तक रहा था.

ये भी पढ़ें: कब और किन लोगों को सबसे पहले मिलगी कोरोना वैक्सीन?

हम सभी जानते हैं कि लोकमान्य ने कारावास में छह साल बिताए लेकिन मुझे विश्वास है कि बहुत कम लोगों को ये पता होगा कि उस अवधि में उन्हें किस हद तक शारीरिक और मानसिक यंत्रणाओं से गुजरना पड़ा था. वो यहां एकदम अकेले रहे औऱ उन्हें कोई बौद्धिक स्तर का साथी नहीं मिला. मुझे विश्वास है कि उन्हें किसी अन्य बंदी से मिलने-जुलने नहीं दिया जाता था. उनको सांत्वना देने वाली एकमात्र वस्तु किताबें थीं. वो कमरे में अकेले रहते थे. यहां रहते हुए उन्हें दो-तीन से ज्यादा भेटों का मौका भी नहीं दिया गया. ये मुलाकातें भी पुलिस और जेल अधिकारियों की मौजूदगी में हुई होंगी, जिसमें वो कभी खुलकर बात नहीं कर पाए होंगे.

ये भी पढ़ें: क्या भारत को घेरने के लिए चीन PAK में बना रहा है सैन्य बेस? दिखी सैटेलाइट इमेज 

इस यंत्रणा को वही जान सकता है
इसी पत्र में सुभाष ने लिखा, उन तक कोई भी अखबार नहीं पहुंचने दिया जाता था. उनकी जैसी प्रतिष्ठा औऱ स्थिति वाले नेता को बाहरी दुनिया के घटनाचक्रों से एकदम अलग कर देना एक तरह की यंत्रणा ही है.इस यंत्रणा को जिसने भुगता है, वही जान सकता है. इसके अलावा उनके कारावास की ज्यादातर अवधि में देश का राजनीतिक जीवन बहुत मंद गति से खिसक रहा था. इस विचार ने उन्हें कोई संतोष नहीं दिया होगा कि जिस उद्देश्य को उन्होंने अपनाया था, वह उनकी अनुपस्थिति में आगे बढ़ रहा है.

ये भी पढ़ें: जानिए, सैटेलाइट से आप कैसे पा सकेंगे ट्रेनों की सटीक जानकारी 
उनकी शारीरिक यंत्रणा के बारे में जितना ही कम कहा जाए, बेहतर होगा. वे दंड संहिता के तहत बंद थे. इस प्रकार आज के राजबंदियों की अपेक्षा कुछ मायनों में उनकी दिनचर्या कहीं अधिक कठोर रही होगी. इसके अलावा उन्हें डायबिटीज की बीमारी थी. जब लोकमान्य यहां थे,मांडले का मौसम तब भी अमूमन ऐसा ही रहा होगा, जैसा कि ये आजकल है. यहां की जलवायु शिथिल कर देने वाली, पेट रोगों तथा गठिया को जन्म देने वाली है और धीरे धीरे पक्के तौर पर ये व्यक्ति की जीवनी शक्ति को सोख लेती है, तो लोकमान्य ने, जो वयोवृद्ध थे, कितना अधिक कष्ट झेला होगा.

कारागार की चहारदीवारियों में उन्होंने क्या यातनाएं सहीं, इसके विषय में लोगों को बहुत कम जानकारी है

इस कारागार की चहारदीवारियों में उन्होंने क्या यातनाएं सहीं, इसके विषय में लोगों को बहुत कम जानकारी है. कितने लोगों को पता होता है, वो गीता की भावना में मग्न रहते थे और शायद इसलिए दुख और यंत्रणाओं से ऊपर रहते थे. यही कारण है कि उन्होंने उन कष्टों के बारे में किसी से कभी एक शब्द नहीं कहा.

समय-समय पर मैं इस सोच में डूबता रहता हूं कि कैसे लोकमान्य को अपने बहुमूल्य जीवन के छह लंबे साल ऐसी स्थितियों में बिताने के लिए विवश होना पड़ा होगा. हर बार मैने अपने आपसे पूछा कि अगर नौजवानों को इतना कष्ट महसूस होता है तो महान लोकमान्य को अपने समय में कितनी पीड़ा सहनी पड़ी होगी. जिसके बारे में देशवासियों को कुछ भी पता नहीं रहा होगा.

ये भी पढ़ें: अब एलियंस के बारे में कौन सा सीक्रेट बताने जा रहा है अमेरिका? 

उनमें गजब की इच्छाशक्ति थी
सुभाष ने पत्र में आगे लिखा, ये दुनिया भगवान की बनाई हुई है लेकिन जेलें मनुष्य ने बनाईं हैं. सभ्य समाज के विचार और संस्कार जेलों पर लागू नहीं होते. किसी को अगर ये वाकई अनुभव पाना है कि इतने ज्यादा प्रतिकूल, शक्तिहारी और दुर्बल बना लेने वाले वातावरण में लोकमान्य ने जिस तरह गीता रहस्य जैसे महान ग्रंथ की रचना करने के लिए उन्होंने वाकई जबरदस्त इच्छाशक्ति, साधना की गहराई और सहनशीलता दिखाई होगी. जिसे इन सबका अनुभव पाना है, उसे जेल में आकर रहना चाहिए.

तिलक का जन्म महाराष्ट्र स्थित रत्नागिरी जिले के एक गांव चिखली में हुआ था

जहां तक मेरी बात है, मैं इस विषय में जितना सोचता हूं, उतना ही उनके प्रति आदर और श्रृद्धा में डूब जाता हूं. आशा करता हूं कि मेरे देशवासी लोकमान्य की महत्ता को आंकते हुए इन सभी तथ्यों को भी ध्यान में रखेंगे. जो महापुरुष मधुमेह से पीड़ित होने के बाद भी इतने लंबे तक कारावास को झेलता गया और अपनी सारी बौद्धिक क्षमता और संघर्ष शक्ति को बनाए रख सका. उन्होंने इस जेल के अंधकारपूर्ण दिनों में अपनी मातृभूमि के लिए ऐसी अमूल्य भेंट तैयार की.

वैसे भी जब लोकमान्य ने मांडले जेल को अंतिम नमस्कार किया था, तो उनके जीवन के दिन गिने-चुने ही रह गये थे. निसंदेह ये एक गंभीर दुख का विषय है कि हमने अपने महानतम पुरुषों को इस प्रकार खोते रहे.

आदरपूर्वक
आपका स्नेहभाजन
सुभाष सी बोस

सुभाष ने लोकमान्य को लेकर ये पत्र जिन नृसिंह केलकर को लिखा था, वो महाराष्ट्र के जाने माने साहित्यकार थे. साथ ही तिलक के केसरी अखबार के संपादक और ट्रस्टी भी थे. तिलक के जेल जाने पर वही अखबार का संपादन करते थे. बाद में वो केंद्रीय संविधान सभा में चुने गए.

Source

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें